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माँ दुर्गा की द्वितीय शक्ति का रूप ब्रह्मचारिणी का है

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माँ दुर्गा की द्वितीय शक्ति का रूप ब्रह्मचारिणी का है। नवरात्र के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी का आवाहन ध्यान व पूजा की जाती है। ब्रह्म में लीन होकर तप करने के कारण इस महाशक्ति को ब्रह्मचारिणी की संज्ञा दी गई है। यह देवी ज्योतिर्मयी एवं अत्यन्त भव्य हैं। इनके दाहिने हाथ में जप की माला तथा बायें हाथ में कमण्डल रहता है। माता सदैव आनन्दमय रहती है।
पूर्व जन्म में ये हिमालय की पुत्री थीं, तब नारद जी के उपदेश से भगवान शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करन के लिये घोर तपस्या में लीन हो गईं। तप करने के कारण इनका नाम तपश्चारिणी भी पड़ा। कठोर तपस्या के पश्चात् इनका विवाह भगवान शिव जी के साथ हुआ।
माँ के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें अलौकिक तेज व कांति से सुसंपन्न करके कर्मयोगी जीवन जीने की कला सिखाता है। यह हमें प्रज्ञा व तेज प्रदान करके हमारी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करता है।माँ दुर्गा की द्वितीय शक्ति का रूप ब्रह्मचारिणी का है। नवरात्र के दूसरे दिन माता ब्रह्मचारिणी का आवाहन ध्यान व पूजा की जाती है। ब्रह्म में लीन होकर तप करने के कारण इस महाशक्ति को ब्रह्मचारिणी की संज्ञा दी गई है। यह देवी ज्योतिर्मयी एवं अत्यन्त भव्य हैं। इनके दाहिने हाथ में जप की माला तथा बायें हाथ में कमण्डल रहता है। माता सदैव आनन्दमय रहती है।
पूर्व जन्म में ये हिमालय की पुत्री थीं, तब नारद जी के उपदेश से भगवान शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करन के लिये घोर तपस्या में लीन हो गईं। तप करने के कारण इनका नाम तपश्चारिणी भी पड़ा। कठोर तपस्या के पश्चात् इनका विवाह भगवान शिव जी के साथ हुआ।
माँ के दिव्य स्वरूप का ध्यान हमें अलौकिक तेज व कांति से सुसंपन्न करके कर्मयोगी जीवन जीने की कला सिखाता है। यह हमें प्रज्ञा व तेज प्रदान करके हमारी सुषुप्त शक्तियों को जागृत करता है।